बैगा और गोंड जनजाति में जादू एवं जादू क्रियाएं

 

अजीत कुमार बंजारे

पीएच.डी. शोध छात्र, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

 

शोधसार:-

बैगा एवं गोंड जनजाति में जादू एवं जादू क्रियाएॅं संबंधी अध्ययन हेतु अचानकमार टाईगर रिजर्व एरिया में गोंड एवं बैगा परिवारों में 45-45 परिवारों के स्त्री पुरुषों का जादू टोना संबंधी कारणों एवं क्रियाओं का अध्ययन उद्देश्य मूलक निदर्शन विधि द्वारा किया गया। जिसमें जादू-टोना संबंधी विचार को जाना गया और पाया गया कि दोनों जनजातियों में जादू-टोना संबंधी विचार समान हैं, और पांच कारणों को जादू-टोना संबंधी कारण होने की आशंका को सारणी द्वारा स्पष्ट किया गया जिसमें पांच कारण इस प्रकार हैं।

1.     बार-बार बीमार होना और ठीक नहीं होना।

2.     बच्चे का रोज रात में रोना।

3.     गर्भपात होना।

4.     खाने पीने में रुचि नहीं लेना।

5.     5.झुपना

 

उपरोक्त कारण 50 प्रतिशत से ऊपर हैं, जो इस तथ्य को इंगित करते हैं कि इनकी संस्कृति में यह पीढ़ी दर पीढ़ी यह विश्वास आ रहे हैं एवं इन्हीं  कारणों को देखते हुए अध्ययन का उद्देश्य यह है कि

1.जादू-टोना उनके जीवन में क्या मायने रखता है।

2.जादू-टोना संबंधी उनके विचार क्या है।

3.उनके जादू-टोना संबंधी अर्द्धदेवता का स्वरुप क्या है।

4.उनकी संस्कृति में यह तथ्य क्यों है।

 

उपरोक्त जादू-टोना संबंधी कारण जिन्हें जादू-टोना होने की आशंका माना जाता है। उसे करने वाले प्रमुख जादूगत अद्धदेवता (अलौकिक शक्ति) जैसे- रक्शा-रक्शिन, मरी-मसान, चटिया-मटिया, भूत एवं प्रेत-प्रेतिन हैं। जिसे बैगा अपने मंत्र से ठीक करता है एवं इन्हें वश में भी करने का मंत्र जानता है, चुडैल इन अर्द्धदेवता को वश में करके किसी स्त्री-पुरुष, बालक-बालिका पर जादू करती है और उसे प्रभावित करती है। जिससे उपरोक्त कारण बनते हैं।

 

जिससे जादू-टोना संबंधी उनके विचार-आदिम स्तर पर है एवं इनके अर्द्धदेवता का स्वरुप मानवकृति में है जो मानव नहीं होकर अलग प्राणी हैं। उनकी संस्कृति में यह तथ्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी विश्वास से आये हैं एवं इनके जीवन में जादू-टोना इसलिए मायने रखता है कि यदि यह सामान्य दवा से ठीक नहीं होते तो अन्य डाक्टर को दिखाने के बजाय जादू-टोना हुआ है, ऐसा विश्वास मानकर झाड़ फूक कराते हैं। इसलिए यह एक सामाजिक समस्या है।         

 

प्रस्तावनाः

आदिम मानव प्रारंभिक समय से ही प्राकृतिक घटनाओं को देखा करता था तो अवश्य ही यह सोचा करता था कि इन प्राकृतिक घटनाओं के पीछे अदृश्य शक्ति है जिसके कारण यह प्रकृति इतनी चमत्कारपूर्ण है।

 

 

जीवन जीना और पेट भरना बहुत मुश्किल था और ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ता गया। जंगलीपन से सभ्य क्रम की ओर वैसे-वैसे मानसिक विकास भी हुआ। उद्विकासवादी मानवशास्त्री फ्रेजर के अनुसार मानसिक प्रक्रिया के उद्विकास के फलस्वरुप जादू-धर्म तथा विज्ञान की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार इन्होंने ज्ीम हवसकमद इवनही की रचना की और इस पर प्रकाश डाला इसी संदर्भ में मैलिनोवास्की की 1948ण् डंहपबए ैबपमदबमए ंदक त्मसपहपवदण्  इस पुस्तक में इन्होंने जादू को प्रारंभिक अवस्थ बताया इसके पश्चात् धर्म और धर्म के बाद मनुश्य जब स्वयं को बहुत ज्यादा बुद्धिमान मान लेता है त वह प्रत्येक तथ्य को तर्क के तौलता है तब विज्ञान का जन्म होता है। 1915ए  ज्ीम म्समउमदजंतल थ्वतउे व ित्मसपहपवने स्पमि इस पुस्तक में इमाइल दुर्खीम ने धर्म को एक नशा बताया है लेकिन जादू को अस्वीकार नहीं किया हैै।

 

वास्तव में प्रत्येक समाज में चाहे वह जाति हो या जनजाति सभी समाजों में जादू-टोना जैसे शब्द मिल जाते हैं और जिसे कुछ व्यक्ति करते हैं जानते हैं परंतु यह केवल आभासी होते हैं और इस जादू वास्तविक आधार को जादू करने वाला व्यक्ति मंत्रों के द्वारा जादू करता है और मंत्र किसी देवता से संबंधित होता है। कुछ जादू करने वाले भूत-प्रेत का सहारा लेकर जादू करते हैं। जादू अथवा टोना-टोटका व्यक्तिगत होता है और व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए इसे करता है। वह लाभ अथवा हानि के लिए इसे करता है किन्तु सामान्य व्यक्ति शिक्षित अथवा अशिक्षित इसके अन्दर छुपे हुए तथ्य अथवा भाव को समझ नहीं पाता क्योंकि यह लौकिक स्तर का नहीं होता।

 

इसी संदर्भ में अचानकमार टाईगर रिजर्व एरिया में बैगा और गोंड जनजाति की संस्कृति में जादू और टोना-टोटका से संबंधित उन तथ्यों को समझा गया जो अछूते हैं। इन दोनों जनजाति में जादू टोना संबंधित क्रियाएं प्रक्रियाएं मान्यता को जानने का प्रयास किया गया है। जादू सदैव और सदैव निम्न देवता भूत-प्रेत, मंत्रों एवं विचित्र क्रिया और स्वयं के लाभ तथा अर्द्धदेवता से संबंधित होता है। जिसे फ्रेजर ने आभासी कहा है यह जादू-टोना शब्द में जादू-टोना एक साथ जोड़ते हैं कुछ ये कहते हैं कि जादू से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है पर शहरी समाज में जादूगर जो दिखाता है वो महज एक आइटम या हाथ की सफाई होती है जिसमें विज्ञान का पुट होता है। किन्तु ग्रामीण परिवेश में और जनजातीय परिवेश में जो जादू-टोना जैसे शब्द होते हैं, वह कुछ अलग संदर्भ लिए होते हैं।

 

समस्या का वर्णन-

वर्तमान समय में जहां आधुनिक शिक्षा का प्रभाव हो रहा है लोग शिक्षित हो रहे हैं, विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास हो रहा है। फिर भी जनजातीय परिवेश इससे अछूता नहीं है, लेकिन जनजाति समुदाय जो ग्रामीण संरचना का एक अंग है, वे अपनी संस्कृति से जुड़े हुए हैं। अपनी संस्कृति से जुड़े होने के कारण उनमें अंधविश्वास का समावेश हो गया है, किंतु इसके दृष्टिकोण से वह अंधविश्वास नहीं होकर विश्वास है कि जादू-टोना होता है जिसे कुछ लोग करते हैं।

 

जिस विश्वास को आधुनिक शिक्षा अथवा आधुनिक प्रौद्योगिकी दूर नही कर पा रही है। कारण इनकी शिक्षा की कमी तथा समाज की मुख्य धारा में नहीं होना है। लेकिन शहरी क्षेत्रों में जादू-टोना का अभाव है और ग्रामीण अथवा जनजातीय क्षे़त्र में इसका विश्वास विद्यमान है। चूंकि गांवों से ही शहर बने ग्रामीण व्यक्ति शहरों में रोजगार के लिये आया तो अपनी संस्कृति को लेकर आया किन्तु शहर में जादू अथवा टोना जैसे विचार-विश्वास नहीं उभर कर आये चूंकि ग्रामीण क्षेत्र में जादू-टोना के जानकार होते हैं। इसलिये उनके साथ होता है। जो एक व्यक्तिगत अनुभव होता है। इसलिए शिक्षित व्यक्ति भी नही चाहकर भी कुछ घटनाओं पर विश्वास कर लेता है। लेकिन मूल समस्या ज्यों कि त्यों बनी हुई है। क्योंकि यदि कोई बीमारी हो तो डाक्टर अथवा वैद्य उसे ठीककर सकता है। लेकिन उन शक्तियों अथवा अदृश्य कारणों को कोई समझ नहीं सकता। जो देखे अथवा समझे नहीं जा सकते जो अनुभव के तथ्य होते हैं।

 

उद्देश्य

1.     जादू-टोना उनकी जीवन में क्या मायने रखता है।     

2.     जादू-टोना संबंधी उनके विचार क्या हैं।

3.     उनके जादू-टोना संबंधित अर्द्धदेवता का स्वरुप क्या है। 

4.     उनकी संस्कृति में यह तथ्य क्यों है।

 

अध्ययन सामग्री एवं शोध प्रविधि-

शोध विषय से संबंधित जानकारी अवलोकन के साथ अनुसूची-साक्षात्कार के द्वारा लोगों से मिली जानकारी एवं व्यक्तिगत साक्षात्कार एवं समूह साक्षात्कार से 90 परिवारों के महिला पुरुषों का उद्देश्य मूलक निदर्शन विधि द्वारा सूचनादाताओं का चयन करके सूचना एकत्रित की गयी।

 

अध्ययन क्षेत्र-

मुंगेली जिले के लोरमी तहसील के अंतर्गत अचानकमार टाईगर रिजर्व क्षेत्र 12 कि.मी. पश्चिम में सुरही वनग्राम पंचायत में 90 परिवारों के वयस्क महिला-पुरुषों का अध्ययन किया गया।

 

बैगा पुरुष जादू-टोना पर विश्वास 81.82 प्रति है। जिसमें महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा विश्वास रखती हैं। इसी प्रकार गोंड पुरुष का जादू-टोना के प्रति विश्वास 88.64 प्रति. हैं एवं गोंड महिलाओं का प्रतिशत 84.78 प्रति. है एवं गोंड महिलाओं का प्रतिशत 84.78 प्रति. है जिसमें गोंड पुरुषों का प्रतिशत महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा है। इसी प्रकार बैगा पुरुषों का जादू-टोना के प्रति अविश्वास 23.91 प्रति. है तथा महिलाओं का प्रतिशत 18.18 प्रति. है। गोंड पुरुषों में अविश्वास का प्रतिशत 11.36 है और गोंड महिलाओं में 15.22 रहा। इसी प्रकार इसका कुल प्रतिशत देखने पर विश्वास का कुल प्रतिशत 82.78 है तथा अविश्वास 17.22 है। जो यह दर्शाता है कि ग्रामीण अथवा जनजाति परिवेश में जादू-टोना पर विश्वास संस्कृति से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी का हस्तांतरित होता है।

 

क्र. 1 का कारण बैगा महिलाओं में जादू-टोना को स्वीकार करने का 66.66 प्रति. तथा नहीं का प्रतिशत 33.34 है। क्र. 2 का कारण स्वीकार करने का प्रतिशत 66.66 तथा नहीं का प्रतिशत 33.34, क्र. 3 का प्रतिशत स्वीकार करने का प्रतिशत 77.77 प्रतिशत एवं नहीं का प्रतिशत 22.23, क्र. 4 का प्रतिशत स्वीकार करने का प्रतिशत 53.33 तथा नहीं का प्रतिशत 46.67 है। इसी प्रकार क्र. 5 का स्वीकार करने का प्रति. 100 तथा नहीं का 0 प्रति. है। इसी प्रकार गोंड महिलाओं का स्वीकार करने का क्र.1 का प्रतिशत 61.12 एवं नहीं का 38.08 है क्र. 2 का स्वीकार करने का प्रतिशत 66.66 एवं नहीं का प्रतिशत 33.34 है। क्र. 3 का स्वीकार करने का प्रतिशत 78.88 एवं नहीं का 21.12 प्रति. है। क्र. 4 का स्वीकार का प्रतिशत 56.66 एवं नहीं का प्रतिशत 43.34 है एवं क्र. 5 का प्रतिशत 0ः है, और जिसका कुल प्रतिशत स्वीकार करने का 63.88 एवं नहीं का 36.12 एवं क्र. 2 का स्वीकार करने का 66.66 एवं नहीं का 33.34 है एवं क्र. 3 का स्वीकार 78.33 प्रतिशत एवं नहीं का प्रतिशत 21.67 है। क्र. 4 का 55 प्रति. एवं नहीं का 45 प्रति. है एवं क्र. 5 का स्वीकार करने का 100 प्रति. एवं 0 प्रति. है।

 

बैगा पुरुषों में क्र. 1 का कारण स्वीकार करने का 72.23 प्रति. है एवं नहीं का 27.77 प्रति. है। क्र. 2 का स्वीकार करने का 63.34 प्रति. है एवं नहीं का 36.66 है। क्र.3 का स्वीकार करने का 68.88 प्रतिशत एवं नहीं का 31.32 प्रतिशत है, क्र. 4 का स्वीकार करने का प्रति. 57-77 एवं नहीं का 42.23 प्रतिशत है। क्र. 5 का स्वीकार करने का 100 प्रतिशत एवं नहीं का 0 प्रतिशत । इस प्रकार गोंड पुरुषों में क्र. 1 के कारणों को स्वीकार करने का 53.44 प्रतिशत एवं नहीं का 46.66 प्रतिशत एवं क्र. 2 का स्वीकार का 54.45 एवं नहीं का 45.55 एवं क्र. 3 का स्वीकार करने का 67.77 एवं नहीं 32.33 प्रति. है। क्र. 4 का स्वीकार करने का 57.77 एवं नहीं 42.23 प्रति. है। क्र. 5 का स्वीकार करने का 97.77 एवं नहीं 2.23 प्रति. है। इसका कुल प्रतिशत क्र. 1 का स्वीकार करने का 62.77 है एवं नहीं का 37.23 है। क्र. 2 का 58.88 एवं नहीं का 41.12 है क्र. 3 का 68.33 एवं नहीं का 31.67 है। क्र. 4 का 57.77 एवं नहीं का 42.23 है, क्र. 5 का 98.88 एवं नहीं का 1.12 प्रति. है।

 

जादू-टोना होने का कारण- तालिका क्र. 3 एवं तालिका क्र. 4 में बैगा एवं गोंड महिलाओं एवं क्र. 4 में बैगा एवं गोंड पुरुषों में क्र. 1 का कारण दोनों में कारण को स्वीकार करना 60ः से ज्यादा है एवं नहीं का 30ः से ज्यादा है। जो इस विश्वास को दर्शाता है। इसी प्रकार क्र. 2 एवं क्र. 3 दोनों में 6 प्रतिशत से ज्यादा है। क्र. 4 में दोनों में 50 प्रति. से ज्यादा है और क्रमांक 5 में महिलाएं एवं 100 प्रति. है एवं पुरुषों में 98.88 है। जो झुपना को दर्शाता है। जिसमें जादू करने वाला उसके शरीर को प्रभावित करता है और भयभीत होता है अथवा शरीर को हिलाता है एवं सर को  हिलाकर-हिलाकर जादू करने वाला स्वयं को प्रकट करता है या करती है। जिसमें इनका विश्वास सबसे ज्यादा है, लेकिन यह अनुभव है।

 

बैगा एवं गोंड में जादू क्रियाएं- बैगा अपनी जादुई क्रियाओं और अपने संस्कारित मान्यता के लिए एक कौतुहल का विषय है क्योंकि बैगा अपने जीवन में सारी क्रियाएं अपनी मिथक की प्रेरणा से करते है। इसी प्रकार गोंड भी छत्तीसगढ़ की एक सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है। अचानकमाह टाईगर रिजर्व में बैगा एवं गोंड जनजाति कई पीढ़ी से एक साथ रहते पाये हैं इसीलिए दोनों के देवी-देवता अलग है। लेकिन दोनों की संस्कृति एक दूसरे से मिली-जुली हुई है। विवाह, धार्मिक देवता गोत्र अलग हैं, लेकिन सांस्कृतिक तत्व दोनों में समान हो गये है। इसी प्रकार जादू-टोना की मान्यता एवं इनके अर्द्धदेवता समान है, और इसकी अवधारणा भी समान है इसी प्रकार गोंड और बैगा जनजाति की जादुई क्रियाएं एवं अर्द्धदेवता इस प्रकार है।

 

1. चुडैल-

चुडैल श्शब्द जनजाति में मिलता है जिसे टोहनी कहते हैं। जिसे 80ः लोगों ने नही देखा पर 20ः लोगों का यह कहना है कि देखा नही है, अनुभव किया है। यह चुडैल या टोहनी अर्द्धदेवता को मानती है और अपनी स्थानीय बोली में मंत्र द्वारा टोना लगाती है। यह टोना देखने या छूने से लगता है जिसे पांग देना कहते हैं- इस पांग देना का प्रभाव यह होता है कि व्यक्ति कमजोर हो जाता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, पर मृत्यु किसी बीमारी से भी हो सकती है, इनका मानना है कि यह रात में मंत्र पढ़ती है। यह भूत-प्रेत-मसान तीर से शक्ति प्राप्त करती है और जिसे यह पसंद नहीं करती उसके ऊपर जादू-टोना करती है प्रभाव यह होता है कि वह बड़बड़ाने लगता है या छोटा बना हो तो खाना नहीं खाता पांग (जादू-टोना) लगने पर किसी महिला अथवा पुरुष को ओझा के पास ले जाते हैं। तो चुडैल ने उसे टोना है तो वह झुपने लग जाता है या लग जाती है, और उसके भीतर में जिस महिला ने जादू-टोना किया या वह उसके भीतर से बोलने लग जाती है।

 

सारणी-3 में झुपना को बैगा महिला एवं गोंड महिलाएं 100 प्रति. मानती है, और बैगा एवं गोंड पुरुष 98.88 प्रति. स्वीकार करते है। लेकिन इसका तार्किक आधार नहीं है। लेकिन सांस्कृतिक सोच के कारण यह उनमे विद्यमान है।

 

2. बैगा-ओझा-शमन- यह पंडित से अलग होता है जो यहां होता है किसी को जादू-टोना भूत-प्रेत चढ़ा हो तो वह अपने मंत्र से ठीक करता है, यह अपने भूत से यह ज्ञात करता है अमूक व्यक्ति को भूत चढ़ा है या टोना हुआ है, क्योंकि वह भूत को मंत्रों के द्वारा वंश में किया होता है, और स्वयं ऐसे मंत्र किसी बैगा अथवा पूर्वज से सीखता है। कोई विद्वान इसकी वास्तविकता ज्ञात नहीं कर पाता क्योंकि इस ओझा के अलावा और कोई नहीं जानता कि इसके ऊपर किसका प्रभाव है।

 

3. रक्शा-रक्शिन-किसी कंुवारी लड़की की मृत्यु होने पर वह रक्शिन बनती है और लड़का रक्शा बनता है। चुड़ैल इसे बस में करके बच्चों को रोज रात में रुलाती है। रात में इनकी आंखे चमकती है।

 

4. मरी-मसान- इनका ऐसा मानना है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर उसे दफनाया जाता है। चुड़ैल मरी-मसान को उस शव को खाने के लिए भेजती है और उसकी आत्मा को वश में करके कोठे में रखती है। कुंवारी लड़की जो रोज बीमारी आदि से मरती है मरी कहलाती है। मसान कुंवारा लड़का होता है जो रोग या अकाल मृत्यु से मरता है। चुड़ैल इसे अपने वश में रखती है।

 

5. चटिया-मटिया- यह चटिया-मटिया ढाई फीट के होते हैं, ये दोनों स्त्री-पुरुष होते हैं ये भूत-प्रेम का एक प्रकार होते हैं बैगा (ओझा) इसे वश में करके किसी के घर में भेजता है और उसके घर की सारी संपत्ति उठाकर ओझा को देते हैं उसके कोठे का धान ओझा को देते हैं और वह व्यक्ति गरीब हो जाता है।

 

6. भूत- जब कोई व्यक्ति दुःखी होकर मरता है तो वह मरने के बाद भूत बनता है इसका पैर उल्टा होता है यह धरती से 5 से.मी. ऊपर चलता है इसे ओझा वंश में करके नौकर की तरह काम में लेता है।

 

7. प्रेत-प्रेतिन- इनकी मान्यता यह है कि ये इमली पेड़ पर रहते हैं यह भूत से ज्यादा शक्तिशाली है यह घर में जाकर जुठे थाली में बचा कुचा भोजन करते हैं इसलिए यह मान्यता है कि रात में ही खाना के बाद बर्तन धो देना चाहिए।

 

निष्कर्ष-

बैगा एवं गोंड जनजाति कई पीढ़ीयों से साथ-साथ रह रही है। बैगा विशेष पिछड़ी जनजाति है एवं गोंड एक बहुसंख्यक जनजाति लेकिन दोनों जनजाति साथ-साथ रहती है, इसलिए सामाजिक संगठन समान हो गये हैं। चूंकि गोत्र विवाह, धार्मिक देवता दोनों के अलग हैं। लेकिन कुछ सांस्कृतिक तत्व दोनों में समान हो जाते हैं एक विशेष समय के अंतराल में इसी प्रकार जादू-टोना संबंधी विश्वास भी समान हैं। जादू-टोना के संबंध में कुछ तथ्य ऐसे होते हैं जो तार्किक नहीं होते जो अदृश्य अर्द्धशक्ति होती है-जिसका संचय एक व्यक्ति करता है और इन अर्द्धशक्ति का जुड़ाव मंत्रों से करता है जिसका एक संबंधित नाम होता है।

 

उस मंत्र के माध्यम से वह अर्द्धशक्ति कार्य करती है जिसका सही अथवा गलत प्रयोग हो सकता है। ऐसा इन लोगों का विचार है जो इनकी संस्कृति से जुड़ा हुआ है। चूंकि वैज्ञानिक दृष्टि से जो अनुभवजन्य नहीं होता वह विश्वास के योग्य नहीं होता लेकिन इनकी संस्कृति में जादू-टोना के प्रति विश्वास इनके संस्कृति से आता है जो इनके विचारों क्रियाओं में परीलक्षित होता है। इसलिए जादू-टोना इनके जीवन में मायने रखता है। इसी प्रकार अदृश्य प्राणी जैसे रक्शा-रक्शिन, मरी-मसान, चटिया-मटिया, प्रेत-प्रेतिन, भूत किसी कारण वश अथवा  जादू-टोना से मृत्यु  होने के बाद व्यक्ति इन योनियों में जाता है,तब वह मानव नहीं रहता इसलिए इनके अन्दर मानवीय गुण विद्यमान नहीं होते। जिसको बैगा या चुडैल वश में करते हैं। लेकिन इनके अस्तित्व को यह नही नकार पाते। इसी प्रकार जादू-टोना होने का पांच कारण तालिका क्र. 3 एवं 4 में दर्शाये गये हैं। जिसमें तालिका क्र. 3 में कारण 1, 2 में कुल योग 60 प्रति. से ज्यादा लोग कारण को मानते है का. 4 में 50 प्रति. से ज्यादा एवं का. 5 में 100 प्रति. है। जो यह दर्शाता है कि इन कारणों को भी ये जादू-टोना से संबंधित मानते हैं और बैगा के पास जाते हैं, और जो नहीं स्वीकार करते वह अन्य तथ्यों को स्वीकार करते हैं। लेकिन विश्वास विद्यमान रहता है। इसी प्रकार तालिका क्र. 4 में कुल योग में कारण 1 एवं 3, 60 प्रति. से ज्यादा एवं 2 एवं 4 50 प्रति. से ज्यादा है एवं क्रं. 5  का 98.08 प्रति. है। ता. 3 एवं 4 में कारण स्वीकार नहीं करने का प्रति 40 प्रति. से ज्यादा है। लेकिन 50 प्रति. से ज्यादा नहीं है। जो इनके सांस्कृतिक विश्वास को पुष्ट करता है।

 

सुझाव-

जादू-टोना संबंधी विचार प्रत्येक समाज में होते हैं लेकिन वैज्ञानिकता को भी नहीं नकार जा सकता। तालिका क्र. 3 एवं 4 में जो कारण दर्शाये गये हैं, उसमें 50 प्रति. से ज्यादा महिला एवं पुरुष निवारण के लिए बैगा के पास जाते है। लेकिन बैगा भी कुछ कारणों को ठीक कर पाते हैं और कुछ को नहीं- चूंकि इस समाज और जनजातिय समाज में जादू-टोना जैसी समस्या आम बात है। इसलिए पहले यह देखा जाना चाहिए कि उनकी संस्कृति में यह विश्वास आता है। जादू-टोना का इसलिए वह बैगा के पास जाते हैं अर्थात वह उनसे ठीक होने की अपेक्षा रखते हैं। इसलिए बैगा को जागरुक करके यह प्रशिक्षण देना चाहिए कि कुछ कारणों को वह ठीकं कर सकते इसलिए डाॅक्टर के पास जाने की सलाह लोगों को देना चाहिए, जिससे इस समस्या का समाधान हो सके। यहां एक मानवशास्त्री की भूमिका यह होनी चाहिए कि वह उसकी संस्कृति को समझ कर इस सामाजिक समस्या से निपटने के लिए एक सामाजिक रूप से उन्हे जगाने का प्रयास कर सकता है क्यों कि उनकी संस्कृति को उन्ही के संदर्भ में समझता  है।

 

संदर्भ सूची:

Malinowski, B. 1948  Magic, Science, and Religion and Other Essays.New York: Doubleday,

Durkheim, Emile. 1915    The Elementary Forms of Religious Life.London: George Allen & Unwin.

Frazer, J. George. 1998    The Golden Bough: A Study in Magic and Religio Edited with an introduction by Robert Fraser. Oxford: Oxford University Press.

 

Received on 17.12.2014

Revised on 26.12.2014

Accepted on 30.12.2014     

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Research J. Humanities and Social Sciences. 5(4): October-December, 2014, 454-458